दीवाली की रात
हँसी फुलझड़ी सी महलों में दीवाली की रात
कुटिया रोयी सिसक सिसक कर दीवाली की रात।
कैसे कह दें बीत गया युग ये है बात पुरानी
मर्यादा की लुटी द्रोपदी दीवाली की रात।
घर के कुछ लोगों ने मिलकर खूब मनायीं खुशियाँ
शेष जनों से दूर बहुत थी दीवाली की रात।
जुआ खेलता रहा बैठकर वह घर के तलघर में
रहे सिसकते चूल्हा चक्की दीवाली की रात।
भोला बचपन भूल गया था क्रूर काल का दंशन
फिर फिर याद दिला जाती है दीवाली की रात।
तम के ठेकेदार जेब में सूरज को बैठाये
कैद हो गई चंद घरों में दीवाली की रात।
एक दिया माटी का पूरी ताकत से हुंकारा
जल कर जगमग कर देंगे हम दीवाली की रात।
***
-डॉ० जगदीश व्योम
कुटिया रोयी सिसक सिसक कर दीवाली की रात।
कैसे कह दें बीत गया युग ये है बात पुरानी
मर्यादा की लुटी द्रोपदी दीवाली की रात।
घर के कुछ लोगों ने मिलकर खूब मनायीं खुशियाँ
शेष जनों से दूर बहुत थी दीवाली की रात।
जुआ खेलता रहा बैठकर वह घर के तलघर में
रहे सिसकते चूल्हा चक्की दीवाली की रात।
भोला बचपन भूल गया था क्रूर काल का दंशन
फिर फिर याद दिला जाती है दीवाली की रात।
तम के ठेकेदार जेब में सूरज को बैठाये
कैद हो गई चंद घरों में दीवाली की रात।
एक दिया माटी का पूरी ताकत से हुंकारा
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-डॉ० जगदीश व्योम
7 Comments:
At 11:29 PM,
गिरिराज जोशी said…
"भोला बचपन भूल गया था क्रूर काल का दंशन"
दंश दिखाए
भोला बचपन भी
बहुत खूब!!!
At 7:59 AM,
Unknown said…
giri raj ji k baat se mai sahmat hoon
At 1:02 PM,
Demo Blog said…
पसन्द आयी..!
--
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At 1:02 PM,
Demo Blog said…
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At 7:15 AM,
Demo Blog said…
ईश्वर करे, सबके घर खुशियाँ जगमगाए , इस दिवाली की रात
At 11:08 PM,
अजित गुप्ता का कोना said…
कुटिया रोयी सिसक सिसक कर दीवाली की रात
बेहतरीन रचना। आपको बधाई।
At 11:13 PM,
deepa joshi said…
सुंदर रचना
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