हिन्दी साहित्य

Sunday, May 09, 2021

मुक्तक

 कर्म का दीप जला जाता है।
दर्द का शैल गला जाता है। 
वक्त को कौन रोक पाया है, 
वक्त आता है, चला जाता है।। 
    
-डॉ अशोक अज्ञानी 

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